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जब फिल्म की शूटिंग ने खराब कर दी क्रिकेट पिच! सौरव गांगुली की बायोपिक से जुड़ा विवाद, 1953 में भी हुआ था ऐसा अनोखा किस्सा

Cricket, Cinema, and the Leicester Pitch Controversy

Cricket Film Shooting Controversy: क्रिकेट का मैदान आमतौर पर खिलाड़ियों के प्रदर्शन, रोमांचक मुकाबलों और ऐतिहासिक जीत का गवाह बनता है। लेकिन क्या हो जब यही मैदान किसी फिल्म की शूटिंग की वजह से विवादों में घिर जाए? इंग्लैंड के लेसेस्टर में हाल ही में कुछ ऐसा ही देखने को मिला, जहां भारतीय क्रिकेट के पूर्व कप्तान सौरव गांगुली की बायोपिक की शूटिंग ने एक बड़े क्रिकेट विवाद को जन्म दे दिया। दिलचस्प बात यह है कि क्रिकेट और सिनेमा के बीच ऐसा टकराव पहली बार नहीं हुआ। करीब सात दशक पहले 1953 में भी एक फिल्म को लेकर ऐसा ही अनोखा मामला सामने आया था, जिसने उस दौर के क्रिकेट जगत में खूब चर्चा बटोरी थी।

गांगुली की बायोपिक की शूटिंग के बाद पिच पर मचा बवाल

इंग्लैंड के लेसेस्टर स्थित अपटनस्टील ग्रेस रोड मैदान पर सौरव गांगुली की जिंदगी पर बन रही फिल्म ‘दादा: द सौरव गांगुली स्टोरी’ की शूटिंग की गई थी। अगस्त में इसी मैदान पर लेसेस्टरशायर और ग्लेमोर्गन के बीच काउंटी चैंपियनशिप का मुकाबला खेला जाना था।

हैरानी की बात यह रही कि मैच शुरू होने से महज चार दिन पहले मैदान पर क्रिकेट खिलाड़ियों की जगह फिल्म की टीम काम कर रही थी। शूटिंग से पहले भी तकनीकी कर्मचारियों की आवाजाही जारी थी, लेकिन इस पूरे घटनाक्रम की असली चर्चा तब शुरू हुई जब अगले मुकाबले में पिच के व्यवहार को लेकर शिकायत सामने आई।

मैदान के हेड ग्राउंड्समैन कैलम लेविन ने क्रिकेट रेगुलेटर को बताया कि फिल्म की शूटिंग के दौरान ग्राउंड स्टाफ को पिच पर जरूरी काम करने की अनुमति नहीं दी गई थी। यहां तक कि पिच को सुरक्षित रखने के लिए कवर डालने की भी इजाजत नहीं मिली।

उस समय इंग्लैंड में भीषण गर्मी पड़ रही थी। शूटिंग वाले दिन तापमान करीब 35 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया था, जबकि गर्मी का एहसास लगभग 38 डिग्री जैसा था। बताया गया कि पिच करीब आठ घंटे तक बिना कवर के खुली रही।

मैच में 43 बार दिखा असमान उछाल, क्लब पर लगा जुर्माना

फिल्म की शूटिंग खत्म होने के चार दिन बाद जब लेसेस्टरशायर और ग्लेमोर्गन के बीच मुकाबला खेला गया, तो पिच का मिजाज चर्चा का विषय बन गया। गेंद कई बार असमान तरीके से उछलती दिखाई दी। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार, मैच के दौरान कंप्यूटर सिस्टम ने 43 बार अनइवन बाउंस दर्ज किया।

लेसेस्टरशायर ने यह मुकाबला 42 रन से जीत लिया, लेकिन जीत से ज्यादा चर्चा पिच की खराब स्थिति को लेकर हुई। अंपायरों की शिकायत के बाद पिच को ‘पुअर’ यानी खराब रेटिंग दी गई।

इसके बाद मेजबान लेसेस्टरशायर काउंटी क्रिकेट क्लब पर 5,000 पाउंड का आर्थिक जुर्माना लगाया गया। साथ ही क्लब के खाते से 27 अंक काटे गए। हालांकि, अपील के बाद अंक कटौती को घटाकर 19 कर दिया गया।

क्लब के कर्मचारियों ने पिच की खराब स्थिति के पीछे फिल्म की शूटिंग के दौरान ग्राउंड स्टाफ को काम नहीं करने दिए जाने को वजह बताया। हालांकि, क्लब ने आधिकारिक तौर पर फिल्म निर्माताओं को जिम्मेदार नहीं ठहराया। इसकी वजह यह थी कि शूटिंग की अनुमति पहले से ली गई थी और समझौते में पिच की स्थिति को लेकर शर्तें भी शामिल थीं।

जब 1953 में फिल्म के लिए बनाया गया था नकली ओवल स्टेडियम

लेसेस्टर की यह घटना क्रिकेट और सिनेमा के रिश्ते की एक नई मिसाल जरूर है, लेकिन इस तरह की परेशानी का सामना फिल्म निर्माताओं को कई दशक पहले भी करना पड़ा था।

साल 1953 में ‘द फाइनल टेस्ट’ नाम से एक ब्रिटिश फिल्म बनाई गई थी। इस फिल्म की कहानी क्रिकेट के इर्द-गिर्द घूमती थी और इसका मुख्य किरदार सैम पामर नाम का एक अनुभवी इंग्लिश क्रिकेटर था, जो अपने करियर का आखिरी टेस्ट मैच खेलने जा रहा था।

फिल्म के निर्देशक एंथनी एस्क्विथ थे और इसकी कहानी टेरेंस रैटिगन ने लिखी थी। कहानी में सैम पामर के क्रिकेट करियर के साथ उसके पारिवारिक रिश्तों को भी दिखाया गया था। उसका बेटा रेगी क्रिकेट के बजाय साहित्य में दिलचस्पी रखता था। पिता की क्रिकेट के प्रति दीवानगी और बेटे की अलग पसंद के बीच पीढ़ियों का टकराव फिल्म की कहानी का अहम हिस्सा था।

इस फिल्म में आखिरी टेस्ट मैच का दृश्य मशहूर ओवल क्रिकेट मैदान पर दिखाया जाना था। लेकिन असली मुश्किल तब खड़ी हुई जब फिल्म निर्माताओं को ओवल में शूटिंग की अनुमति नहीं मिली।

इतना ही नहीं, उस समय चल रहे वास्तविक एशेज टेस्ट मैच की रिकॉर्डिंग का इस्तेमाल करने की अनुमति भी नहीं दी गई। ऐसे में फिल्म निर्माताओं के सामने सबसे बड़ा सवाल था कि बिना असली मैदान पर शूटिंग किए टेस्ट मैच जैसा माहौल कैसे तैयार किया जाए?

Pinewood Studios में तैयार कर दिया गया हूबहू क्रिकेट मैदान

फिल्म निर्माताओं ने इस समस्या का अनोखा समाधान निकाला। उन्होंने मशहूर पाइनवुड स्टूडियो में ओवल क्रिकेट ग्राउंड की एक शानदार प्रतिकृति तैयार कर दी।

इस सेट को इतनी बारीकी से बनाया गया था कि पवेलियन से लेकर मैदान के दूसरे हिस्सों तक सब कुछ असली ओवल जैसा दिखाई देता था। फिल्म में शामिल इंग्लैंड के अनुभवी क्रिकेटर भी इस सेट को देखकर हैरान रह गए थे।

यहां तक कि इस अस्थायी मैदान को शूटिंग के बाद भी सुरक्षित रखने और दर्शकों के लिए खोलने का विचार सामने आया था।

इंग्लैंड के महान बल्लेबाज लेन हटन ने भी अपनी किताब में इस सेट की तारीफ करते हुए बताया था कि वहां खेलते समय ऐसा महसूस होता था, जैसे वे वास्तव में किसी टेस्ट मैच का हिस्सा हों।

फिल्म में नजर आए थे इंग्लैंड के कई दिग्गज क्रिकेटर

‘द फाइनल टेस्ट’ की सबसे खास बात यह थी कि इसमें केवल अभिनेता ही नहीं, बल्कि उस दौर के कई वास्तविक अंतरराष्ट्रीय क्रिकेटरों ने भी हिस्सा लिया था।

फिल्म में लेन हटन, डेनिस कॉम्पटन, एलेक बेडसर, गॉडफ्रे इवांस, जिम लेकर और सिरिल वॉशब्रुक जैसे बड़े नाम अपने ही किरदार में दिखाई दिए थे।

इसके अलावा उस दौर के मशहूर क्रिकेट कमेंटेटर जॉन अर्लोट ने फिल्म के टेस्ट मैच वाले हिस्से के लिए कमेंट्री की थी। फिल्म निर्माताओं ने बीबीसी से वास्तविक टेस्ट मैच की रिकॉर्डिंग भी खरीदी थी।

इस तरह फिल्म में स्टूडियो में शूट किए गए काल्पनिक दृश्यों के साथ वास्तविक क्रिकेट फुटेज का इस्तेमाल किया गया। असली खिलाड़ियों की मौजूदगी और वास्तविक मैच की आवाजों ने फिल्म के क्रिकेट वाले हिस्से को काफी वास्तविक बना दिया था।

फिल्म रिलीज होते ही क्रिकेट जगत में उठे थे सवाल

जब फिल्म की शूटिंग और उसमें शामिल खिलाड़ियों की भूमिका से जुड़ी बातें सार्वजनिक हुईं, तो क्रिकेट जगत में विवाद खड़ा हो गया।

कुछ आरोप लगे कि लेन हटन, डेनिस कॉम्पटन और अन्य खिलाड़ी वास्तविक एशेज टेस्ट के दौरान मैदान छोड़कर फिल्म की शूटिंग के लिए चले गए थे।

यह भी दावा किया गया कि खिलाड़ियों की मदद से फिल्म की टीम के एक कैमरामैन को ड्रेसिंग रूम तक पहुंच मिली थी, जहां उसने वास्तविक माहौल और बातचीत को रिकॉर्ड किया।

हालांकि, इन आरोपों को साबित करने के लिए कोई ठोस प्रमाण सामने नहीं आया। एमसीसी की ओर से भी खिलाड़ियों के खिलाफ किसी बड़ी अनुशासनात्मक कार्रवाई की पहल नहीं हुई।

इस तरह फिल्म को लेकर विवाद तो खूब हुआ, लेकिन अंततः यह क्रिकेट और सिनेमा के मेल की एक यादगार मिसाल बन गई।

असली एशेज मुकाबले ने फिल्म की कहानी को बना दिया ऐतिहासिक

साल 1953 का इंग्लिश क्रिकेट सीजन अपने आप में बेहद खास था। इंग्लैंड 1932-33 के बाद से एशेज ट्रॉफी जीतने में सफल नहीं हुआ था। उस साल ऑस्ट्रेलिया और इंग्लैंड के बीच सीरीज के शुरुआती चार मुकाबले ड्रॉ रहे थे।

ऐसे में पूरी सीरीज का फैसला ओवल में खेले जाने वाले आखिरी टेस्ट पर निर्भर था। इंग्लैंड की कप्तानी लेन हटन के हाथों में थी और टीम के सामने एशेज वापस जीतने की बड़ी चुनौती थी।

इस निर्णायक मुकाबले में जिम लेकर और टोनी लॉक की गेंदबाजी ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। दोनों ने मिलकर ऑस्ट्रेलिया को दूसरी पारी में 162 रन पर समेटने में मदद की और इंग्लैंड ने मुकाबला जीतकर एशेज अपने नाम कर ली।

दिलचस्प बात यह रही कि वास्तविक क्रिकेट इतिहास में घटी इस घटना ने ‘द फाइनल टेस्ट’ की कहानी को भी एक नया संदर्भ दे दिया। फिल्म में दिखाया गया काल्पनिक आखिरी टेस्ट उस समय के वास्तविक एशेज मुकाबले की यादों से जुड़ गया।

सिरिल वॉशब्रुक को नहीं पसंद आई फिल्म की अपनी भूमिका

फिल्म में शामिल लगभग सभी क्रिकेटरों ने इसके अनुभव की तारीफ की थी, लेकिन सिरिल वॉशब्रुक इससे पूरी तरह खुश नहीं थे।

वॉशब्रुक को फिल्म में खुद का ही किरदार निभाना था। कहानी में उन्हें सिर्फ 40 रन बनाकर आउट होते दिखाया गया था, जबकि लेन हटन के हिस्से में शतक आया था।

वॉशब्रुक को यह बात पसंद नहीं आई कि फिल्म में उनकी बल्लेबाजी को इतनी कम सफलता मिली और हटन को ज्यादा शानदार दिखाया गया। बताया जाता है कि वे बाद में भी फिल्म के इस पहलू का जिक्र करते रहे।

क्रिकेट और सिनेमा की ये दोनों कहानियां बताती हैं कि जब असली खेल और फिल्मी दुनिया एक ही मैदान पर आमने-सामने आते हैं, तो नतीजा हमेशा सिर्फ मनोरंजन तक सीमित नहीं रहता। कभी एक फिल्म की शूटिंग पिच को विवादों में ला देती है, तो कभी नकली मैदान पर बनाई गई फिल्म क्रिकेट इतिहास का हिस्सा बन जाती है।

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